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Jharkhand
 
11 वर्षों का सफर
 
झारखण्ड अपने गठनकाल से ही राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरता रहा है और इन 11 वर्षों मेंं कई बार बनी और गिरा दी गई किसी सरकार ने यहां की जनता को यह भरोसा नहीं दिला पायी है कि उन्हें इस अस्थिरता से मुक्ति कब मिलेगी. वर्तमान सरकार भाजपा, आजसू और झामुमो गठबंधन की है जिसके अंदर सत्ता की मारामारी अभी जोारों पर. विधायकों की असंतुष्टी राज्य के अवरूद्ध विकास के खिलाफ न होकर बोर्ड और निगमों की लूट के लिए है. अभी एक दैनिक अखबार में झामुमो नेता और उप मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन का बयान आया ‘‘ यदि कांग्रेस मुख्यमंत्री पद देता है तो उसके समर्थन से सरकार बनायी जा सकती है’’ यह विचित्र बयान है. अभी जो गठबंधन की सरकार है उसके पहले झामुमो कांग्रेस के समर्थन में ही सरकार चला रही थी लेकिन वह सरकार ज्यादा दिन टिक नहीं पायी और खुद शिबु सोरेन जो उस समय मुख्यमंत्री थे उनकी हालत काफी हास्यास्पद हो गई थी. यह बयान एक संकेत और भी देता है कि अभी भाजपा, आजसू और झामुमो गठबंधन में उठापटक चल रही है और इस रोज के उठापटक और राजनीतिक नौंटंकी का राज्य के जरूरी मुद्दों से कोई सरोकार नहीं है. इसका राज्य और यहां की जनता के विकास पर जो प्रतिकूल असर पड़ रहा है उसकी चिंता यहां के राजनितीक दलों और विधायकों को नहीं है. मुख्यमंत्री ने 5 रूपया में दाल-भात योजना तो शुरू कर दी लेकिन गरीबों की आमदनी में 5 रूपया का इजाफा कैसे हो इसके लिए जमीनी स्तर पर सरकार की कोई पहल नजर आ रही है. राज्य में हर क्षेत्र का विकास अवरूद्ध है और इस अवरूद्ध विकास का सबसे ज्यादा खमियाजा यहां के गरीब तबकों और आदिवासी समाज को चुकाना पड़ रहा है.
आदिवासियों के रोजगार एवं विकास के नाम पर एवं बिरसा मुंडा की जयन्ती के अवसर पर 15 नवम्बर 2000 को गठित इस झारखण्ड राज्य ने मात्र 11 वर्ष के दौरान ही अब तक 8 विभिन्न सरकारों का तमाशा देखा है. इन तमाम सरकारों में मुख्यमंत्री आदिवासी ही रहें हैं लेकिन वे भी आदिवासियों की विभिन्न जनसमस्याओं व मुद्दों को हल करने के बजाए उनकी समस्याओं को बढ़ाने का ही काम किया है. गुलाम भारत में अंग्रेजों के खिलाफ यहां के आदिवासियों के लंबे संघर्ष के बाद हासिल हुई छोटानागपुर काश्तकारी कानून और संताल परगना काश्तकारी कानून का उल्लंघन कर आदिवासी जमीनों की हेराफेरी व लूट में झारखण्ड राज्य बनने के बाद अत्याधिक तेजी आई है. यहां तक कि इन लूटों में राजनेताओं के साथ ही नौकरशाहों की मिलिभगत भी सामने आ रही है. सार्वजनिक उद्योगों व संस्थानों के निर्माण, केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विभिन्न परियोजनाओं के निर्माण सहित निजी क्षेत्र के कई उद्योगों की स्थापना में सबसे अधिक आदिवासी विस्थापित हुए हैं जो भूमिहीन, मकानहीन व सामाजिक पहचान से वंचित दयनीय लोगों के समूह में बदल गए हैं. विस्थापित हुए आदिवासियों व अन्य लोगों के रोजगार, मुआवजा, पुर्नवास की ज्यादातर लम्बित पड़ी समस्याओं को हल करने के बजाए विभिन्न राज्य सरकारों ने अब तक 100 से ज्यादा एमओयू किया है जिनको लागू कराने के लिए लाखों एकड़ जमीन आदिवासी बहुल किसानों से लेकर राज्य में तीसरे दौर का बड़े पैमाने पर विस्थापन का काम जारी है. दरअसल ये एमओयू राज्य के विकास से कोई नाता नहीं रखते और यदि ऐसा होता तो पूर्व से ही इस राज्य में अन्र्तराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के कई उद्योग हैं, लेकिन इन उद्योगों ने यहां के गरीबों को राहत दे सकी. कई सार्वजनिक उद्योग तो इसलिए बंद कर दिये गयें ताकि निजी उद्योगों को बढ़ावा मिल सके, कई उद्योगों में श्रम शक्ति कर दिया गया और कई की हालत काफी खराब है. रांची का एच0ई0सी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. सार्वजनिक उद्योगों के विकास के बजाय बहुराष्ट्रीय निगमों एवं बड़ी कंपनियों को उत्खनन तथा दूसरे प्रोजेक्टों के ठेके दिये जा रहें हैं, जो आदिवासियों व अन्य गरीबों को उनकी जमीन से बेदखल कर रहें हैं और उन्हें उनके वन, पत्थर आदि दूसरे संसाधनों से अलग कर रहें हैं. महानगरों में बढ़ते असंगठित मजदूर इन्हीं इलाकों से आते हैं और इन्हें काफी कम मजदूरी में अपने परिवार का पालन-पोषण करना पड़ता है. 
राज्य में काफी लंबे अरसे के बाद पंचायत चुनाव सम्पन्न तो हुआ लेकिन पंचायतों को अभी भी दूसरे राज्यों की तरह संपूर्ण अधिकार नहीं दिया गया. नरेगा (मनरेगा) एवं अन्य ग्रामीण विकास योजनाएं भ्रष्टाचार और लूट की शिकार हैं जिस कारण आदिवासी एवं अन्य ग्रामीण जनता रोजगार एवं विकास की करोड़ो रूपये के कोष से वंचित रहे है. फलतः आदिवासी बहुल ग्रामीण जनता परिवार सहित पलायन करने को मजबूर है. वहीं आदिवासी लड़के-लड़कियां गरीबी एवं बेरोजगारी के कारण हर वर्ष पलायन कर दिल्ली आदि बड़े महानगरों में घरेलु नौकर, नौकरानी, गार्ड, चपरासी, दिहाड़ी मजदूर आदि का काम करने तथा विभिन्न प्रकार के शोषण झेलने को विवश हैं. आदिवासियों व दलितों के लिए आरक्षित बैकलाॅग सहित रिक्त पदों पर बहाली नहीं किये जाने के कारण आदिवासी व दलित युवा नौकरियों से वंचित है. शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त होने तथा शिक्षा तक पहुंच की कमी के कारण आदिवासियों व दलितों में, विशेषकर इन वर्गों की महिलाओं में साक्षरता दर अत्याधिक कम है, ये महिलाएं एवं इनके बच्चे खून की कमी के कारण कुपोषण के शिकार हैं. जनवितरण व्यवस्था घ्वस्त होने के कारण हर वर्ष आदिम जनजातीयों सहित अन्य गरीबों की मौत भूख से होती है. आदिवासियों, दलितों व गरीबों के विकास व कल्याण मद में कटौती की जा रही है वहीं इन्हें दूसरे गैर जरूरी मदों में खर्च किया जा रहा है. आदिम जनजातीय समूहों का अस्तित्व संकट में है. 5वीं अनुसूची क्षेत्र होने के बावजूद राज्य सरकार ने जनजातीय परामर्शदात्री परिषद को मजबूत करने का काम नहीं किया है. इन तमाम स्थितियों का लाभ साम्प्रदायिक व विभाजनकारी ताकतें उठा रहीं हैं और राज्य की जनता बार-बार ठगी की शिकार हो रही है.
काफी उठापटक के बाद राज्य में पुनः नई गठबंधन की सरकार बनी तो है लेकिन इस सरकार की विश्वसनता पर भी संदेह है. विधायकों व राजनीतिक दलों की गुटबाजी चरम पर है. राज्य के जरूरी मुद्दों को उठाने और उनपर संघर्ष करने के लिए ईमानदार प्रयास नहीं देखा जा रहा है. जनता रोज-रोज की घोषनाओं से हैरान-परेशान है. झारखण्ड के 12वें स्थापना दिवस के अवसर पर झारखण्ड की जनता यही आशा कर सकती है कि यहां की सरकार जनता में विश्वास जगाये और समस्त राज्य को विकास के रास्ते आगे ले जाय. अब आगे भी झारखण्ड का भविष्य यहां की जनता को ही तय करना है. इसलिए यह जरूरी है कि राज्य की जनता एक बेहतर विकप के हाथों मंे ही राज्य को संभालने और विकास के रास्ते आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी दे ताकि वह एक पिछड़े राज्य के बजाए देश के सबसे उन्न्त व सम्प्न्न राज्य का निवासी होने पर गर्व कर सके.
 
शशिकान्त
 

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